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Saturday, 27 August 2011

बाराम में होता अपराध बोध


हरिराम पाण्डेय
बीती जुलाई में एक करीबी रिश्तेदार के विदेश में नौकरीशुदा सुपुत्र की शादी में बिहार के अपने गांव जाना हुआ। बारात सिवान से मीरगंज के समीप इंटवा धाम पर जानी थी। बड़ा आग्रह था तो मैंने भी सोचा गांव की शादी देखी जाए। सिवान ग्गहहोपालगंज जिले में बारातियों की खातिरदारी के बारे में काफी कुछ सुन रखा था।
मैंने भी पूरी तैयारी की। नये कपड़े सिलवाये सिलवाया, जूते खरीदे। पूरे रास्ते सोचता रहा कि कैसी आवभगत होगी वगैरह वगैरह। पहुँचे तो स्वागत हुआ सामान्य रुप से।
नाश्ता मिला। उसके बाद शादी की रस्में शुरु हुईं और बारात में मुझ जैसे लोग चुपचाप इंतजार करने लगे बेहतरीन भोजन का। समय बीतता गया और घड़ी की सुइयों के साथ ही पेट की आंतों ने क्रांति शुरु कर दी।
जनवासा जहां था सड़क की दूसरी तरफ इंटवा धाम का मंदिर और उसमें! अखंड कीर्तन। ढोल और झाल पर लगातार हरे राम हरे- कृष्णा और संन्यासियों -गृहस्थों का अबाध आवागमन। सड़क की दूसरी तरफ एक पोखर और उसी के किनारे तने शामियाने में जनवासा। जेनरेटर से बिजली और उसपर तेज धुन में बजता फिल्मी गीत- मुन्नी बदनाम हीई डार्लिंग तेर लिये। इस गीत पर बड़े फूहड़ ढंग से नाचती कमउम्र नर्तकी और उसे अश्लील इशारे करते बाराती। सड़क के किनारे मेरे जैसे इंसान की अजीब गति , एक कान में हरे राम... और दूसरे में बदनाम होती मुन्नी की आर्त पुकार और आंतों में भूख की क्रांति। वहां बैठा रहना एक विशेष प्रकार का अपराध बोध था।
आखिरकार साढ़े बारह बजे मैंने पूछ ही लिया कि भाई खाना कब मिलेगा? कुछ बुजुर्ग लोगों ने आंखों-आंखों में इशारा भी किया कि ऐसे नहीं पूछते। खैर मैं कलकत्ता वाला होने के नाते थोड़ा तो बेशर्म हो सकता था। कहा गया बस पांच मिनट में सब तैयार हो जाएगा।
उनके पांच मिनट करीब ढाई घंटे के बाद हुए। रात के दो बजे खाने के लिए बुलाया गया। जुलाई की उमस में रात, रात ही होती है। खाने पर बैठे तो प्लेटें आई जिसमें पूरियाँ, दो सब्जियाँ, और चटनी थी। और दो प्लेटों में कुछ और सब्जियाँ। पूरी तोडऩे की कोशिश की तो समझ में आया कि पूरियाँ धूप में! सुखा कर रखीं गयीं हैं। वही हाल पूरे भोजन का था। खाना ठंडा था। एक सब्जी से बदबू भी आ रही थी।
मरता क्या न करता और पूछा जाता रहा, पूरियाँ चाहिए? क्या कहता? बोल भी नहीं पाया कि खाना बहुत खराब है। बाराती जो ठहरे। कमोबेश सारे बाराती भूखे पेट वापस लौटे।
कारण समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। लड़की के परिवार वाले अच्छे घर के हैं। सम्मानित लोग हैं फिर भी मेहमानों के साथ ऐसा व्यवहार? यह अद्भुत अनुभव लेकर मैं अपने गाँव लौट आया।
कोलकाता वापस लौटने के क्रम में गाँव से स्टेशन के लिए गाड़ी किराए पर ली। मन में बारात वाली बात ही थी। अपनी पत्नी से यही बातें कर रहा था तो ड्राइवर ने कहा, 'अरे सर आप क्या बात कर रहे हैं आजकल यहाँ शादियों में यही होता है।Ó
इससे पहले कि मैं कारण पूछता, उसने ख़ुद ही बताना शुरु कर दिया, 'सर मैं कल ही एक बारात से लौटा हूं। खाने में पनीर की सब्जी बनाया गया था लेकिन उसमें नमक और मिर्च इतना डाल दिया गया कि खाना दूभर था। बारातियों ने तो खा लिया लेकिन ड्राइवरों ने लड़की वालों से पूछ ही लिया कि भई आपने इतना मंहगा भोजन बनाया फिर इसमें इतना नमक क्यों डाल दिया है? खाना परोसनेवालों का जवाब था, दस लाख रुपए लीजिएगा तो ऐसा ही खाना खाना पड़ेगा।Ó
मेरे ड्राइवर ने किस्सा जारी रखा, हम ड्राइवरों ने पूछा कि आप लड़की वालों ने दहेज दिया, लड़के वालों ने लिया तो इसमें बारात का क्या कसूर? तो लड़की वाले बोले, जब दहेज पूरा नहीं हो रहा था तो आप ही गांव वाले थे जो कह रहे थे कि लड़के को आने नहीं देंगे शादी के लिए। अब बोलिए। लड़के की शादी हो रही है। आप यही खाइए। लड़की के बिना बारात वापस ले जाने की बात करेंगे तो मार खाइएगा।
ड्राइवर की बात सुनी तो समझ में आया कि माजरा क्या है। समझ में आया कि आजकल बिहार में बहुत से लोग बारात में शामिल होने से कतराते क्यों हैं।
गलती किसकी कहें? लड़की वाले मजबूरी में दहेज देते हैं तो अपनी नाराजगी किस पर निकालें? लड़के और लड़के के घर वालों पर तो नहीं निकाल सकते। बीच में फँसते हैं बाराती जिनके साथ की जाती है बदतमीजी। लेकिन बात बारातियों की या मेहमानों की बेइज्जती की नहीं है। बात एक सामाजिक समस्या की है जो अब एक अनोखा रुप ले रही है।
शायद वो दिन आए जब लोग बारात जाने से पहले ये कहें कि अगर दहेज लिया है तो हम बारात में नहीं आ सकेंगे।
मैंने डाक्टरों, इंजीनियरों और सरकारी अधिकारियों को दहेज लेते और देते देखा है। तर्क ये रहता है कि सामाजिक दबाव है, शादी का खर्च कौन देगा इत्यादि।
एक अलग तरह का सामाजिक दबाव बनता दिख रहा है लेकिन वो अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। बाराती किसी शादी का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं जो शादी को सामाजिक प्रामाणिकता देते हैं। अगर वो पीछे हटें तो दबाव बनता है।
मैंने तो तय कर लिया है। अब किसी की भी शादी में बारात जाने से पहले ये जरुर पूछूंगा, भाई दहेज लिया है तो बता दो। मैं नहीं आऊंगा। और अगर जाना ही पड़े तो कम से कम घर से खाना खाकर बारात में जाऊंगा।

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